गुजरात: 'एकता की मूर्ति' हेतु जमीन अधिग्रहण का विरोध

गुजरात में नर्मदा (सरदार सरोवर बांध) बांधस्थल के नजदीक प्रस्तावित सरदार पटेल की 182 मीटर ऊंची 'एकता की मूर्ति' को इसके आसपास के 70 गांवों के आदिवासियों के विरोध का सामना करना पड़ रहा है। गत 2 अक्टूबर को करीब 2000 आदिवासी, आदिवासी बहुल नर्मदा जिले के नांडोड तालुका के इंद्रवर्ण गांव के नजदीक इकट्ठा हुए और उन्होंने इस क्षेत्र में पर्यटन के उद्देश्य से भूमि अधिग्रहित किए जाने के सरकारी प्रस्ताव का विरोध किया।

केवड़िया क्षेत्र विकास प्राधिकरण (काडा) जिसका सन् 2005 में इस क्षेत्र में पर्यटन अधोसंरचना विकास हेतु गठन किया गया था, ने इस वर्ष के शुरू में 54 गांवों की पंचायतों से इस संबंध में सहमति मांगी थी। इनमें से 29 गांव संरक्षित वन क्षेत्र में आते हैं। काडा विरोध मंच जो कि नरेंद्र मोदी के सपनो की परियोजना का विरोध कर रहे लखी भाई का कहना है कि, ''काडा ने ग्रामीणों से कहा है कि वे उसके साथ अपनी भूमि की हिस्सेदारी करें। काडा ने यह भी कहा है कि यदि उन्होंने (ग्रामीणों) समय पर उत्तर नहीं दिया तो इसे उनकी सहमति मान लिया जाएगा और उनकी भूमि ले ली जाएगी। अधिकांश ग्राम पंचायतों ने 'इंकार' कर दिया है और उनका कहना है कि वे बजाए नगर नियोजन के अपनी ग्राम पंचायतों के प्रावधानों के अंतर्गत ही विकास करेंगे।''

काडा की योजना है कि वह इस क्षेत्र में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए नगर नियोजन योजना के अंतर्गत ही विकास करे जिससे कि वह होटल, केंपिंग ग्राउंड, ट्रेकिंग स्थल, रिसोर्ट, वाटर पार्क, गोल्फ कोर्स आदि निर्मित कर सकें। प्रस्तावित 'एकता की मूर्ति' की वजह से पर्यटन में विस्तार की संभावनाओं को देखते हुए काडा ताबड़तोड़ कार्य करना चाह रहा है। मूर्ति का निर्माण बांध से नीचे की ओर करीब 3.2 किलोमीटर की दूरी पर साधु टेकरी पर होगा। उम्मीद है कि इसका कार्य सन् 2014 की शुरुआत में प्रारंभ होगा और यह 4 वर्षों में पूरा हो जाएगा। लेकिन काडा को आदिवासी गांवों से विरोध का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि वे अपनी भूमि नहीं देना चाहते। केवड़िया गांव निवासी विक्रम ताड़वी का कहना है कि, ''सरकार को जमीन देना कोई अच्छा विचार नहीं है, क्योंकि राज्य सरकार ने अब तक उन 16 गांवों के किसानों को मुआवजा नहीं दिया है जिनकी जमीनें नर्मदा बांध की वजह से डूब में आ गई थीं। ग्रामीणों को तो अभी तक पूर्व में हुई हानि का ही मुआवजा नहीं मिला है और सरकार विकास के लिए और जमीन चाहती है? हमारा विचार है कि हमें हमारी भूमि का ठीक मुआवजा नहीं मिला। यदि एक बार हमसे हमारी जमीन ले ली तो हम आजीविका कैसे चलाएंगे।’’

विरोध कर रहे आदिवासियों ने 'जान देंगे-जमीन नहीं' 'जमीन रोटलो आपे छे', 'आमरो गांव -आमरो राज' और 'विकास जोइये छे ना कि विनाश' जैसे नारे लगाए और काड़ा का विरोध किया। (  साभार: इंडियन एक्सप्रेस)

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1 टिप्पणियाँ:

  1. सरदार पटेल संघ को देश द्रोही मानते थे. इनके पास अपने नायक हैं नहां कहीं से भी उठा लेते हैं. अपनी जिद में यह फासीवादी अब इन आदिवासियों का कत्ल-ए-आम करेगा.

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